पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव का असर अब भारत के कृषि क्षेत्र पर भी साफ दिखाई देने लगा है, जहां वित्त वर्ष 2025-26 में उर्वरक उत्पादन 13 वर्षों में पहली बार गिरावट के साथ सबसे कमजोर स्तर पर पहुंच गया है। इस दौरान उत्पादन में 0.1 प्रतिशत की मामूली लेकिन महत्वपूर्ण गिरावट दर्ज की गई, जो वर्ष 2013 के बाद पहली बार हुआ है, जबकि पिछले कई वर्षों से इसमें लगातार औसतन 2.1 प्रतिशत की सालाना वृद्धि हो रही थी। इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह मार्च 2026 में आई भारी कमी रही, जब उत्पादन में 24.6 प्रतिशत का तेज संकुचन दर्ज किया गया, जो अप्रैल 2012 के बाद से अब तक की सबसे बड़ी मासिक गिरावट मानी जा रही है। दरअसल, इस दौरान एलएनजी (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) की आपूर्ति बाधित हो गई, जिसके कारण अधिकांश यूरिया संयंत्रों को बंद करना पड़ा और रखरखाव कार्य शुरू करना पड़ा, जिससे उत्पादन पर सीधा असर पड़ा। मार्च में यूरिया उत्पादन करीब 27 प्रतिशत घटकर सिर्फ 18 लाख टन रह गया, जबकि सामान्य तौर पर यह 20 से 25 लाख टन के बीच रहता है। इसके साथ ही फॉस्फोरस (P) और पोटाश (K) आधारित उर्वरकों का उत्पादन भी 16 से 24 प्रतिशत तक गिर गया, क्योंकि इनके निर्माण के लिए जरूरी कच्चे माल की सप्लाई भी प्रभावित हुई। पूरे साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो शुरुआत में भी उत्पादन दबाव में था, अप्रैल 2025 में उत्तर भारत का एक बड़ा संयंत्र बंद होने से 5 से 6 लाख टन की कमी आई, हालांकि बाद में कुछ महीनों में सुधार हुआ, लेकिन मार्च की भारी गिरावट ने पूरे साल के सकारात्मक प्रदर्शन को नकारात्मक में बदल दिया। दूसरी ओर, कॉम्पलेक्स उर्वरकों में डीएपी उत्पादन जनवरी 2026 तक करीब 1.6 प्रतिशत घटा, लेकिन एनपी/एनपीकेएस उर्वरकों में लगभग 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी ने कुछ हद तक संतुलन बनाए रखा, क्योंकि इन्हें फसलों के लिए बेहतर और संतुलित पोषण देने वाला विकल्प माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि उर्वरक उत्पादन में यह गिरावट सीधे तौर पर खेती की लागत बढ़ा सकती है, जिससे किसानों पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा और फसल उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है,
खासकर ऐसे समय में जब कृषि पहले से कई चुनौतियों का सामना कर रही है। हालांकि अप्रैल 2026 में एलएनजी की बेहतर उपलब्धता के कारण उत्पादन में कुछ सुधार की उम्मीद जताई जा रही है और यूरिया उत्पादन फिर से लगभग 20 लाख टन के आसपास पहुंच सकता है, लेकिन यह अभी भी पिछले साल अप्रैल के 21.8 लाख टन के स्तर से कम रहेगा। कुल मिलाकर, यह स्थिति इस बात का संकेत है कि वैश्विक संकट का असर भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था और कृषि व्यवस्था तक गहराई से पहुंच चुका है, और इससे निपटने के लिए सरकार को ऊर्जा आपूर्ति, कच्चे माल की उपलब्धता और घरेलू उत्पादन क्षमता को मजबूत करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे, ताकि भविष्य में ऐसी गिरावट से बचा जा सके और किसानों को स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।
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