सर्वोच्च न्यायालय ने आरटीई के तहत अनिवार्य दाखिले को बरकरार रखा

Supreme Court of India ने शिक्षा के अधिकार (RTE) कानून के तहत गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों के अनिवार्य दाखिले को बरकरार रखते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान केवल एक नीति नहीं बल्कि एक राष्ट्रीय मिशन है, जिसका उद्देश्य देश के हर बच्चे को शिक्षा का समान अवसर देना है। न्यायालय ने कहा कि निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूल भी इस कानून के तहत पात्र छात्रों को प्रवेश देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं और इसमें किसी तरह की देरी या टालमटोल स्वीकार नहीं की जा सकती। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आलोक आराधे की पीठ ने अपने निर्णय में कहा कि कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को शिक्षा से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत दिए गए मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है। अदालत ने यह भी माना कि शिक्षा के अधिकार के तहत 25 प्रतिशत आरक्षण व्यवस्था समाज में समानता लाने और सामाजिक संरचना को सकारात्मक रूप से बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके साथ ही न्यायालय ने जोर दिया कि निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा कानून का प्रभावी क्रियान्वयन बेहद जरूरी है ताकि इसका वास्तविक लाभ हर जरूरतमंद बच्चे तक पहुंच सके। इस मामले में लखनऊ के एक निजी स्कूल की याचिका को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि विद्यालय राज्य सरकार द्वारा निर्धारित पात्रता सूची पर सवाल नहीं उठा सकते और न ही उसे रद्द कर सकते हैं। एक बार जब सरकार की ओर से छात्रों की सूची भेज दी जाती है, तो स्कूलों के पास केवल उन्हें प्रवेश देने का विकल्प बचता है। न्यायालय ने चेतावनी दी कि यदि इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की बाधा डाली गई, तो यह शिक्षा के अधिकार को एक “खोखला वादा” बना देगा, जो संविधान की भावना के खिलाफ होगा।

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