कपास आयात शुल्क पर विवाद: किसानों और उद्योग के बीच संतुलन की चुनौती

देश में कपास की बढ़ती कीमतों के बीच आयात शुल्क घटाने को लेकर सरकार और उद्योग के बीच मतभेद गहराते जा रहे हैं। सरकार ने संकेत दिया है कि वह कपास पर मौजूदा आयात शुल्क को कम करने या पूरी तरह समाप्त करने पर विचार कर रही है, जिस पर संबंधित मंत्रालय मिलकर फैसला लेंगे। दूसरी ओर, कपड़ा मिल मालिक और परिधान उद्योग चाहते हैं कि आयात सस्ता हो ताकि कच्चे माल की लागत कम हो सके। लेकिन इस प्रस्ताव को लेकर व्यापारियों और कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों ने चिंता जताई है कि इससे किसानों को भारी नुकसान हो सकता है, खासकर तब जब खरीफ सीजन की बोआई शुरू होने वाली है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस समय बड़ी संख्या में किसानों ने बेहतर कीमत की उम्मीद में कपास रोक रखी है—अनुमान के मुताबिक करीब 40 लाख गांठें अभी बाजार में नहीं आई हैं। ऐसे में यदि आयात शुल्क घटाया जाता है और सस्ता विदेशी कपास बाजार में आता है, तो घरेलू कीमतें गिर सकती हैं, जिससे किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से भी नीचे बेचने की नौबत आ सकती है। पहले भी ऐसा देखा गया है कि जब आयात शुल्क कम किया गया था, तो कुछ ही महीनों में भारी मात्रा में कपास आयात हुआ और घरेलू किसानों को नुकसान उठाना पड़ा। इसलिए किसान संगठनों और व्यापारियों का एक वर्ग इस फैसले को लेकर सतर्क रुख अपनाने की सलाह दे रहा है। वहीं दूसरी तरफ, वैश्विक परिस्थितियों का भी इस मुद्दे पर असर पड़ रहा है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कपास के दाम बढ़े हैं, जिसका असर भारत में भी देखने को मिल रहा है—अप्रैल के बाद से घरेलू कीमतों में 10-15% तक की वृद्धि दर्ज की गई है। इसके अलावा, 2025-26 के फसल वर्ष में उत्पादन थोड़ा घटकर करीब 290.9 लाख गांठ रहने का अनुमान है, जो पिछले साल से कम है। इन सभी कारकों के चलते सरकार एक संतुलित निर्णय लेने की कोशिश में है, ताकि उद्योग को सस्ता कच्चा माल मिल सके और किसानों के हित भी सुरक्षित रहें।

Manisha Saini
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