पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव का सीधा असर अब भारत की कृषि अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है, जहां उर्वरकों की कीमतों में तेजी के कारण सरकार का सब्सिडी बिल वित्त वर्ष 2027 में करीब 20% तक बढ़ने का अनुमान है। यह स्थिति तब सामने आई है जब केंद्र सरकार ने बजट में उर्वरक सब्सिडी को घटाकर लगभग 1.70 लाख करोड़ रुपये रखने का अनुमान लगाया था, लेकिन मौजूदा वैश्विक हालात ने इस गणना को बदल दिया है। दरअसल, भारत दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक आयातकों में से एक है और पश्चिम एशिया में आपूर्ति प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, जिसका सीधा असर देश के आयात खर्च और सब्सिडी पर पड़ रहा है। खास बात यह है कि सरकार ने किसानों को राहत देते हुए यूरिया और डीएपी (डाई-अमोनियम फॉस्फेट) की खुदरा कीमतों को स्थिर रखने का भरोसा दिया है। उदाहरण के तौर पर, 45 किलो की यूरिया की बोरी की वास्तविक लागत करीब 4000 रुपये होने के बावजूद किसानों को यह मात्र 266.5 रुपये में उपलब्ध कराई जा रही है, बाकी राशि सरकार सब्सिडी के रूप में वहन करती है। खरीफ सीजन को ध्यान में रखते हुए सरकार ने 64 लाख टन यूरिया और 19 लाख टन अन्य उर्वरकों के आयात का फैसला भी किया है, ताकि देश में खाद की कोई कमी न हो। हालांकि, हाल ही में 25 लाख टन यूरिया के आयात के लिए सरकार को दो महीने पहले की तुलना में लगभग दोगुनी कीमत चुकानी पड़ी, जो बढ़ते वैश्विक दबाव को दर्शाता है। उपलब्धता के मोर्चे पर स्थिति फिलहाल संतुलित नजर आ रही है, जहां अप्रैल के अंत तक यूरिया का भंडार जरूरत से कहीं अधिक बना हुआ है और डीएपी की भी पर्याप्त उपलब्धता है। इसके बावजूद सरकार आगे के आयात और उत्पादन का निर्णय मांग और आपूर्ति के आकलन के आधार पर करेगी। दूसरी ओर, ऊर्जा क्षेत्र को लेकर भी आश्वासन दिया गया है कि भारत को पेट्रोल-डीजल के लिए आयात पर निर्भर होने की स्थिति नहीं बनेगी, क्योंकि देश अपनी मजबूत रिफाइनिंग क्षमता के चलते इनका शुद्ध निर्यातक बना हुआ है। कुल मिलाकर, वैश्विक संकट के बावजूद सरकार की कोशिश है कि किसानों पर सीधा बोझ न पड़े और खेती-किसानी की लागत नियंत्रित बनी रहे, भले ही इसके लिए सब्सिडी का भार सरकार को अधिक क्यों न उठाना पड़े।
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