भारतीय मुद्रा भारतीय रुपया पर वैश्विक और घरेलू दबाव एक साथ बढ़ने लगे हैं, जिसके चलते यह हाल ही में 0.32% गिरकर 94.85 प्रति डॉलर के अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर बंद हुआ। इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और विदेशी निवेशकों द्वारा लगातार पूंजी निकासी मानी जा रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड लगभग 3% बढ़कर 115 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया, जिससे भारत जैसे तेल आयातक देशों की मुद्रा पर सीधा दबाव पड़ा। इसका असर केवल भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसी अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं भी रिकॉर्ड निचले स्तर तक गिर गईं। इस तेजी के पीछे पश्चिम एशिया में जारी तनाव एक बड़ा कारण है, जहां ईरान से जुड़े विवाद और होर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने वैश्विक तेल बाजार को अस्थिर कर दिया है। हालांकि यूएई द्वारा ओपेक और ओपेक+ से बाहर निकलने के संकेतों ने कीमतों की तेजी को कुछ हद तक सीमित किया, फिर भी बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है। इन हालातों में अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ है, जिससे रुपये जैसी मुद्राओं पर और दबाव बढ़ा है। घरेलू स्तर पर भी स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है, जहां आयातकों की डॉलर मांग अधिक है और बाजार में नकदी की कमी देखी जा रही है। भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा हाल में सट्टेबाजी रोकने के लिए उठाए गए कदमों का असर अब कमजोर पड़ने लगा है, जिससे अप्रैल में रुपये को मिला अस्थायी सहारा खत्म हो गया। इस साल अब तक रुपया करीब 5.24% कमजोर हो चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में रुपया 94.10 से 95.15 प्रति डॉलर के दायरे में बना रह सकता है, लेकिन जब तक कच्चे तेल की कीमतें ऊंची और विदेशी निवेश का बहिर्वाह जारी रहेगा, तब तक रुपये पर दबाव बना रहना तय है।
Dharmakshetra, Shiv Shakti Mandir, Babu Genu Marg,
Sector 8, Rama Krishna Puram,
New Delhi, Delhi 110022
+91 80031 98250
info@mysba.co.in