भारत का कुल सैन्य व्यय बढ़कर 92.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले साल के मुकाबले 8.9% ज्यादा है। यह बढ़ोतरी अचानक नहीं है, बल्कि इसके पीछे क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियाँ और सैन्य आधुनिकीकरण की रणनीति काम कर रही है। खासकर भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़े तनाव, सीमा पर गतिविधियाँ और नई टेक्नोलॉजी (ड्रोन, मिसाइल, एयर सिस्टम) की जरूरतों ने सरकार को रक्षा बजट बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। रिपोर्ट बताती है कि भारतीय वायुसेना के लिए विमान और संबंधित प्रणालियों पर खर्च में भारी उछाल आया, जबकि ऑपरेशनल और कर्मियों पर खर्च भी बढ़ा है। यह संकेत देता है कि भारत अब केवल संख्या नहीं बल्कि तकनीकी ताकत और तेजी से प्रतिक्रिया देने की क्षमता पर ध्यान दे रहा है। दूसरी तरफ, वैश्विक स्तर पर भी सैन्य खर्च तेजी से बढ़ रहा है। 2025 में पूरी दुनिया का रक्षा व्यय 2,887 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो लगातार 11वां साल है जब इसमें वृद्धि हुई है। इसमें United States सबसे आगे है, जिसने 954 अरब डॉलर खर्च किए—यानी दुनिया के कुल रक्षा खर्च का लगभग 33%। इसके बाद China (336 अरब डॉलर) और Russia (लगभग 190 अरब डॉलर) का स्थान है। जर्मनी और भारत भी टॉप-5 में शामिल हैं, और इन पांच देशों का मिलाकर वैश्विक सैन्य खर्च में 58% योगदान है। खास बात यह है कि एशिया और ओशिनिया क्षेत्र में रक्षा खर्च सबसे तेजी से बढ़ रहा है, जो इस बात का संकेत है कि इस क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव (जैसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र, भारत-पाक संबंध) लगातार बढ़ रहे हैं। भारत के लिए यह बढ़ता रक्षा बजट दोहरी रणनीति को दर्शाता है—एक तरफ तत्काल खतरों से निपटना और दूसरी तरफ भविष्य की सैन्य ताकत तैयार करना। हालांकि भारत का रक्षा खर्च उसकी GDP का 2.3% है, जो Pakistan के 2.9% से थोड़ा कम है, लेकिन कुल राशि के हिसाब से भारत कहीं आगे है। पाकिस्तान ने भी 2025 में अपना रक्षा बजट बढ़ाकर 11.9 अरब डॉलर कर लिया है, खासकर चीन से हथियार खरीद के चलते। कुल मिलाकर, यह ट्रेंड दिखाता है कि दुनिया एक नए “सैन्य संतुलन” की ओर बढ़ रही है, जहां देश अपनी सुरक्षा और रणनीतिक ताकत को तेजी से मजबूत कर रहे हैं—और भारत इसमें एक अहम खिलाड़ी बनकर उभर रहा है।
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