वैश्विक तेल बाजार में इस समय भारी उथल-पुथल देखने को मिल रही है। Brent Crude की कीमत $125 प्रति बैरल के पार पहुंच गई है, जो पिछले कुछ महीनों के मुकाबले बेहद तेज उछाल है। इसकी सबसे बड़ी वजह Iran और United States के बीच बढ़ता तनाव और बातचीत का पूरी तरह ठप हो जाना है। खासकर Hormuz Strait के बंद होने से दुनिया की तेल सप्लाई पर बड़ा संकट खड़ा हो गया है, क्योंकि यह रास्ता वैश्विक तेल व्यापार का एक अहम हिस्सा है। युद्ध अब नौवें सप्ताह में पहुंच चुका है और इसके जल्द खत्म होने के कोई संकेत नहीं मिल रहे, जिससे बाजार में अनिश्चितता और बढ़ गई है। कीमतों में यह तेजी अचानक आई है—फरवरी में जहां ब्रेंट क्रूड करीब $70 प्रति बैरल था, वहीं अब यह $125 से ऊपर पहुंच गया है। यानी कुछ ही हफ्तों में लगभग दोगुनी बढ़ोतरी। विश्लेषकों के मुताबिक, जब तक होर्मुज स्ट्रेट फिर से नहीं खुलता और आपूर्ति सामान्य नहीं होती, तब तक कीमतों में उतार-चढ़ाव और तेजी बनी रह सकती है। इस बीच, अमेरिकी नेतृत्व द्वारा तनाव और बढ़ने की आशंका जताने से निवेशकों की चिंता और गहरा गई है, जिससे बाजार में स्थिरता की उम्मीद कमजोर पड़ गई है। तेल की कीमतों में इस उछाल का असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दिख रहा है। शेयर बाजारों में गिरावट दर्ज की गई—जापान, दक्षिण कोरिया, हांगकांग और भारत के बाजार दबाव में आए। भारत में भी BSE Sensex करीब 1.2% गिर गया। महंगे तेल का सीधा असर महंगाई, ट्रांसपोर्ट लागत और रोजमर्रा के सामान की कीमतों पर पड़ता है। ऐसे में अगर यह स्थिति लंबी चली, तो भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए आर्थिक चुनौती और बढ़ सकती है। कुल मिलाकर, यह संकट केवल एक क्षेत्रीय युद्ध नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक संतुलन को हिला देने वाली बड़ी घटना बनता जा रहा है।
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