उत्तराखंड में खेती लगातार मुश्किल दौर से गुजर रही है और पिछले पांच वर्षों के आंकड़े इस संकट की गंभीर तस्वीर पेश करते हैं। राज्य में करीब 63,291 हेक्टेयर कृषि भूमि बंजर हो चुकी है, जो न सिर्फ खेती के घटते दायरे को दिखाती है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डाल रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह गांवों से तेजी से हो रहा पलायन और वन्यजीवों द्वारा फसलों को लगातार नुकसान पहुंचाना बताया गया है। पहाड़ी क्षेत्रों में पहले से ही कठिन भौगोलिक परिस्थितियां, छोटे खेत और सीमित संसाधन खेती को चुनौतीपूर्ण बनाते हैं, लेकिन जब लोग रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में शहरों की ओर पलायन करते हैं, तो खेत खाली रह जाते हैं और धीरे-धीरे बंजर में बदल जाते हैं। पलायन निवारण आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, यह समस्या खासकर पहाड़ी जिलों में ज्यादा गंभीर है। पौड़ी गढ़वाल इस मामले में सबसे ज्यादा प्रभावित है, जबकि अल्मोड़ा और टिहरी गढ़वाल भी संकटग्रस्त जिलों में शामिल हैं। इन तीनों जिलों में ही राज्य की कुल बंजर कृषि भूमि का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि जंगली जानवरों जैसे बंदर, सूअर और नीलगाय द्वारा फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया जा रहा है, जिससे किसानों का खेती से मोहभंग हो रहा है। जब मेहनत का फल नहीं मिलता, तो किसान खेती छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं, जिससे बंजर भूमि का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। कुल मिलाकर, यह स्थिति केवल कृषि संकट ही नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक चुनौती भी बनती जा रही है। अगर समय रहते इस पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में खेती का क्षेत्र और सिमट सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पलायन रोकने के लिए गांवों में रोजगार के अवसर बढ़ाने, वन्यजीवों से फसलों की सुरक्षा के लिए मजबूत उपाय करने और पहाड़ी क्षेत्रों के अनुकूल कृषि नीतियां लागू करने की जरूरत है। तभी इस बढ़ते संकट को रोका जा सकता है और राज्य की पारंपरिक खेती को फिर से मजबूत बनाया जा सकता है।
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