देश में बढ़ती फीड की कीमतों और कमी के बीच पोल्ट्री सेक्टर के लिए एक नया विकल्प सामने आया है—इथेनॉल प्लांट से निकलने वाला कचरा (DDGS)। पोल्ट्री उद्योग लंबे समय से मक्का की महंगाई और उपलब्धता को लेकर परेशान है, क्योंकि मक्का मुर्गियों के फीड का मुख्य हिस्सा होता है। ऐसे में विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि इथेनॉल उत्पादन के दौरान बचने वाला DDGS (Distillers Dried Grains with Solubles) पोल्ट्री फीड में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे न सिर्फ फीड की लागत कम हो सकती है, बल्कि किसानों और उद्योग को राहत भी मिल सकती है। Poultry Federation of India (PFI) ने भी इस विकल्प को संभावनाओं से भरा बताया है, लेकिन इसके साथ कुछ जरूरी शर्तें भी रखी हैं। PFI के अध्यक्ष रणपाल डाहंडा के अनुसार, DDGS का उपयोग तभी फायदेमंद होगा जब वह तय गुणवत्ता मानकों पर खरा उतरे। उदाहरण के तौर पर, इसमें अफ्लाटॉक्सिन का स्तर 20 PPB (पार्ट्स पर बिलियन) से कम होना चाहिए और नमी 12% से नीचे रहनी चाहिए। अगर ये मानक पूरे नहीं होते, तो मुर्गियों की सेहत पर असर पड़ सकता है और अंडे व चिकन की गुणवत्ता भी गिर सकती है। इसलिए यह जरूरी है कि DDGS का उत्पादन और सप्लाई पूरी निगरानी में हो। दूसरी ओर UP Distillers Association ने भी इस पहल का समर्थन किया है और पोल्ट्री फार्मर्स को इथेनॉल प्लांट का दौरा करने का निमंत्रण दिया है, ताकि वे खुद इसकी गुणवत्ता और प्रक्रिया को समझ सकें। अगर यह मॉडल सही तरीके से लागू होता है, तो इससे “कचरे से कमाई” का नया रास्ता खुल सकता है। इथेनॉल प्लांट का बाय-प्रोडक्ट बेकार जाने के बजाय पोल्ट्री फीड में इस्तेमाल होगा, जिससे एक तरफ उद्योग की लागत घटेगी और दूसरी तरफ किसानों को सस्ता फीड मिलेगा। हालांकि, विशेषज्ञों का साफ कहना है कि गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। सही मानकों के साथ DDGS का उपयोग किया जाए तो यह पोल्ट्री सेक्टर के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है और भविष्य में महंगे फीड की समस्या से भी राहत दिला सकता है।
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