राजस्थान जैसे सूखा प्रभावित राज्य में बढ़ते सोलर प्रोजेक्ट्स को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। कहा जा रहा है कि इन परियोजनाओं के लिए बड़ी संख्या में खेजड़ी जैसे स्थानीय पेड़ों की कटाई की जा रही है। ये वही पेड़ हैं जो रेगिस्तान की पारिस्थितिकी (ecosystem) को संतुलित रखने और ग्रामीण जीवन का सहारा माने जाते हैं। ऐसे में एक तरफ “ग्रीन एनर्जी” को बढ़ावा देने की बात हो रही है, तो दूसरी तरफ प्राकृतिक हरियाली के नुकसान की चिंता भी बढ़ रही है। इसके साथ ही सोलर पैनलों की नियमित सफाई के लिए बड़े पैमाने पर पानी के उपयोग पर भी सवाल उठ रहे हैं। बताया जा रहा है कि कुछ क्षेत्रों में रोजाना लाखों लीटर पानी सफाई में खर्च हो रहा है, जबकि उन्हीं इलाकों में पीने के पानी की पहले से ही कमी है। इससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या यह मॉडल सच में पर्यावरण के अनुकूल है या फिर सीमित संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डाल रहा है। कुल मिलाकर, यह मुद्दा विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की जरूरत को सामने लाता है। ग्रीन एनर्जी का उद्देश्य प्रदूषण कम करना और भविष्य को सुरक्षित बनाना है, लेकिन अगर इसके लिए स्थानीय पेड़, पानी और पारिस्थितिकी को नुकसान हो रहा है, तो नीतियों पर दोबारा विचार करना जरूरी हो जाता है। असली चुनौती यही है कि विकास भी हो और प्रकृति भी सुरक्षित रहे—यही संतुलन आगे की राह तय करेगा।
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