वर्तमान समय में यूरिया और डीएपी जैसे रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग कृषि भूमि की प्राकृतिक उर्वरता को लगातार नष्ट कर रहा है। इन रसायनों के कारण मिट्टी कठोर होती जा रही है, उसकी जल धारण क्षमता कम हो रही है और धीरे-धीरे उपजाऊ भूमि बंजर बनने की ओर बढ़ रही है। इतना ही नहीं, इन रासायनिक उर्वरकों के निर्माण के लिए आवश्यक कच्चे पदार्थों के लिए भी भारत को बड़े पैमाने पर विदेशी आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। इन हानिकारक रसायनों का प्रभाव केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह भोजन और पानी के माध्यम से मानव शरीर तक पहुंचकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों को जन्म देता है तथा भूजल को भी प्रदूषित करता है। दूसरी ओर, लगातार बढ़ती खेती लागत किसानों को कर्ज के जाल में फंसा रही है। इसलिए अब समय आ गया है कि भारत रसायन-आधारित खेती से बाहर निकलकर प्राकृतिक और टिकाऊ कृषि व्यवस्था की ओर तेजी से आगे बढ़े। प्राकृतिक खेती को जन आंदोलन बनाने के लिए आवश्यक है कि रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में कम से कम 50 प्रतिशत तक कमी लाई जाए। इसके स्थान पर गोबर और गौमूत्र से तैयार जीवामृत तथा पंचगव्य आधारित जैविक खेती को बढ़ावा दिया जाए। हरी खाद (Green Manure) और फसल चक्र (Crop Rotation) जैसी पारंपरिक पद्धतियों को अपनाकर मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन और पोषक तत्वों की वृद्धि की जा सकती है। इसी प्रकार बायोगैस संयंत्रों से निकलने वाली उच्च गुणवत्ता वाली स्लरी को खेतों में प्राकृतिक खाद के रूप में उपयोग करना किसानों के लिए सस्ता और प्रभावी विकल्प बन सकता है। इससे मिट्टी की गुणवत्ता सुधरेगी, उत्पादन लागत घटेगी और किसानों की आय में भी वृद्धि होगी। रसायन-मुक्त खेती केवल पर्यावरण संरक्षण का माध्यम नहीं है, बल्कि यह भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता और स्वास्थ्य सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ विषय है। यदि भारत जैविक खाद्यान्न, पारंपरिक तेलों और प्राकृतिक कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण एवं निर्यात को प्राथमिकता देता है, तो देश विश्व बाजार में एक नई पहचान बना सकता है। इससे किसानों को बेहतर मूल्य मिलेगा, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार बढ़ेगा और भारत स्वस्थ एवं टिकाऊ कृषि मॉडल के रूप में दुनिया के सामने उदाहरण प्रस्तुत कर सकेगा।
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