आर्थिक राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक उत्थान

आर्थिक राष्ट्रवाद का सीधा अर्थ है राष्ट्र की संपत्ति राष्ट्र के भीतर ही रहे और उसी का उपयोग राष्ट्र के विकास के लिए हो।” किसी भी देश की आर्थिक मजबूती केवल सरकार की नीतियों से नहीं, बल्कि नागरिकों की छोटी-छोटी आर्थिक आदतों से भी तय होती है। यदि भारत के लोग सोने की अत्यधिक खरीद, अनावश्यक विदेशी पर्यटन और विदेशों में शिक्षा पर होने वाले अत्यधिक खर्च को कम करें, तो देश की अर्थव्यवस्था को बड़ी मजबूती मिल सकती है। वर्तमान में भारत में सोने का घरेलू उत्पादन बहुत सीमित है, जबकि मांग अत्यधिक है। इसी कारण हर वर्ष अरबों डॉलर का सोना विदेशों से आयात किया जाता है, जिससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव पड़ता है। इतना ही नहीं, घरों और लॉकरों में रखा सोना एक प्रकार की “डेड एसेट” बन जाता है, जो न तो उत्पादन में योगदान देता है और न ही देश की GDP को मजबूत करता है। इसी प्रकार विदेशी पर्यटन और विदेशों में होने वाले डेस्टिनेशन वेडिंग जैसे बढ़ते चलन से भी बड़ी मात्रा में भारतीय धन विदेशों में खर्च हो रहा है। यदि यही धन भारत के पर्यटन, होटल, हस्तशिल्प, परिवहन और स्थानीय उद्योगों पर खर्च किया जाए, तो करोड़ों लोगों को रोजगार मिल सकता है और देश की आंतरिक अर्थव्यवस्था मजबूत हो सकती है। भारत अपनी सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत के कारण दुनिया के सबसे आकर्षक देशों में से एक है। इसलिए हमें विदेशी मित्रों और परिचितों को भारत भ्रमण के लिए प्रेरित करना चाहिए ताकि वे भारतीय संस्कृति, योग, आयुर्वेद, अध्यात्म और पर्यटन की विविधता का अनुभव कर सकें। इससे भारत की सांस्कृतिक पहचान वैश्विक स्तर पर और अधिक मजबूत होगी तथा विदेशी मुद्रा अर्जन में भी वृद्धि होगी। भारत को केवल उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था नहीं बल्कि ज्ञान, अनुसंधान और नवाचार आधारित वैश्विक शक्ति बनना होगा। इसके लिए शिक्षा, रिसर्च और उन्नत तकनीक के क्षेत्र में भारत को विश्वस्तरीय केंद्र के रूप में विकसित करना आवश्यक है, ताकि भारतीय विद्यार्थियों को विदेश जाने की आवश्यकता कम पड़े और विदेशी छात्र भारत में शिक्षा प्राप्त करने आएं। साथ ही विदेशों में कार्यरत भारतीयों को अधिक से अधिक धन भारत भेजने के लिए प्रेरित करना चाहिए, जिससे देश की अर्थव्यवस्था और मजबूत हो सके। आर्थिक राष्ट्रवाद का उद्देश्य किसी से अलगाव नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक शक्ति, सांस्कृतिक गौरव और आत्मनिर्भरता को बढ़ाना है। यदि देश का धन देश के विकास, उद्योग, शिक्षा, कृषि और रोजगार में लगेगा, तो भारत न केवल आर्थिक रूप से शक्तिशाली बनेगा बल्कि विश्व मंच पर आत्मविश्वास के साथ नेतृत्व भी कर सकेगा।

Manisha Saini
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