केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी Central Board of Secondary Education की नई ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली को लेकर इस समय देशभर में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। 12वीं बोर्ड परीक्षा के परिणाम आने के बाद लाखों छात्र और अभिभावक लगातार शिकायत कर रहे हैं कि इस बार मूल्यांकन प्रक्रिया में गंभीर तकनीकी गड़बड़ियां हुईं, जिनका सीधा असर छात्रों के अंकों पर पड़ा। पिछले 25 वर्षों से सीबीएसई की कॉपियां जांच रहे वरिष्ठ परीक्षक जीके श्रीवास्तव ने इस पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाते हुए दावा किया कि डिजिटल मूल्यांकन को बिना पर्याप्त तैयारी और ट्रेनिंग के लागू कर दिया गया। उन्होंने बताया कि कॉपियां जांचने के दौरान लगातार सर्वर हैंग होने, पेज देर से खुलने, स्क्रीन पर उत्तर धुंधले दिखने और कई बार पूरे पन्ने गायब होने जैसी समस्याएं सामने आईं। उनके अनुसार कई उत्तर पुस्तिकाओं में फॉर्मूले अधूरे दिखाई दे रहे थे, जिससे परीक्षकों को अनुमान के आधार पर अंक देने पड़े। फिजिक्स जैसे विषयों में स्टेप-मार्किंग सबसे ज्यादा प्रभावित हुई, क्योंकि कई छात्रों के उत्तरों के बीच के स्टेप स्क्रीन पर साफ नजर ही नहीं आ रहे थे। श्रीवास्तव ने कहा कि यदि यही कॉपियां ऑफलाइन जांची जातीं, तो छात्रों को आंशिक अंक आसानी से मिल जाते और उनके साथ अन्याय नहीं होता। उन्होंने यह भी बताया कि परीक्षकों को केवल 7 से 10 दिन की ट्रेनिंग देकर इतने बड़े डिजिटल सिस्टम में उतार दिया गया, जबकि लाखों छात्रों का भविष्य इस प्रक्रिया से जुड़ा हुआ था। कई पुराने शिक्षक तकनीकी प्रक्रिया को पूरी तरह समझ ही नहीं पाए। इसके अलावा कॉपी जांच के दौरान सर्वर बार-बार बंद हो जाता था, पेज गायब हो जाते थे और एक-एक उत्तर देखने में मिनटों लग जाते थे, जिससे परीक्षकों में तनाव और चिड़चिड़ापन बढ़ा तथा मूल्यांकन की गुणवत्ता प्रभावित हुई। सबसे गंभीर आरोप उन मामलों को लेकर सामने आए जिनमें छात्रों की सप्लीमेंट्री कॉपियों के पन्ने सिस्टम में दिखाई ही नहीं दिए। जीके श्रीवास्तव के अनुसार रायपुर और रांची जैसे केंद्रों पर कई कॉपियों में पेज नंबर सीधे 3 से 5 पर पहुंच रहा था, यानी बीच का पन्ना गायब था। कुछ मामलों में छात्रों द्वारा लिखा गया पूरा पेज स्क्रीन पर खाली दिखाई दे रहा था। उन्होंने पुराने मैनुअल सिस्टम की तुलना करते हुए कहा कि पहले कॉपियों की 5 स्तरों पर री-चेकिंग होती थी एग्जामिनर, असिस्टेंट हेड, हेड एग्जामिनर और कोऑर्डिनेशन कमेटी तक हर नंबर की जांच होती थी लेकिन नए डिजिटल सिस्टम में यह प्रक्रिया घटाकर केवल दो स्तरों तक सीमित कर दी गई। इस पूरे विवाद ने तब और जोर पकड़ लिया जब कई ऐसे छात्रों के उदाहरण सामने आए जो मेडिकल प्रवेश परीक्षा National Testing Agency की उत्तर कुंजी के आधार पर 650 से अधिक अंक ला रहे थे, लेकिन सीबीएसई बोर्ड में फिजिक्स जैसे विषयों में 40-50 अंक तक सिमट गए। सोशल मीडिया पर वायरल हुए कुछ छात्रों के नंबर बढ़ाए जाने के बाद अन्य छात्रों और अभिभावकों में यह भावना और मजबूत हुई कि सभी छात्रों के साथ समान न्याय नहीं हो रहा। बढ़ते विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री Dharmendra Pradhan ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि मूल्यांकन प्रक्रिया में तकनीकी कमियां सामने आई हैं और इसकी जिम्मेदारी वे स्वयं लेते हैं। उन्होंने कहा कि इस वर्ष लगभग 17 लाख छात्रों की 98 लाख उत्तर पुस्तिकाओं के करीब 40 करोड़ स्कैन पेज डिजिटल तरीके से जांचे गए हैं, जो देश के इतिहास में पहली बार हुआ। मंत्री ने भरोसा दिलाया कि सभी उत्तर पुस्तिकाएं सुरक्षित हैं और बड़े स्तर पर री-इवैल्युएशन की प्रक्रिया शुरू की जा रही है ताकि किसी भी छात्र के साथ अन्याय न हो। इस पूरे मामले ने अब राजनीतिक रूप भी ले लिया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi ने सरकार पर निशाना साधते हुए सवाल उठाया कि OSM प्रणाली का कॉन्ट्रैक्ट ‘COEMPT’ नाम की कंपनी को क्यों दिया गया, जबकि उसका पुराना नाम ‘Globarena’ पहले से विवादों में रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की लापरवाही का खामियाजा लाखों छात्रों को भुगतना पड़ रहा है और यदि छात्रों के भविष्य की वास्तव में चिंता होती तो जिम्मेदार अधिकारियों पर पहले ही कार्रवाई हो चुकी होती। वहीं शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि विपक्ष डिजिटल इंडिया और तकनीकी सुधारों का विरोध कर रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक और पारदर्शी बनाना है, लेकिन जहां भी तकनीकी त्रुटियां हुई हैं, उन्हें सुधारा जाएगा और हर छात्र की शिकायत का समाधान किया जाएगा।
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