देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण दक्षिण-पश्चिम मॉनसून इस बार अपनी सामान्य तिथि से कुछ दिन देर से पहुंच रहा है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार अगले दो-तीन दिनों में मॉनसून केरल में प्रवेश कर सकता है, जबकि सामान्य तौर पर इसकी शुरुआत 1 जून के आसपास मानी जाती है। पहले अनुमान लगाया गया था कि मॉनसून 26 मई तक केरल पहुंच जाएगा, लेकिन मौसमीय परिस्थितियों में बदलाव के कारण इसकी गति धीमी पड़ गई। हालांकि अब अरब सागर, लक्षद्वीप, केरल, तमिलनाडु और बंगाल की खाड़ी के कई हिस्सों में मॉनसून के आगे बढ़ने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन चुकी हैं। इसके बावजूद मौसम विभाग की नई भविष्यवाणी ने किसानों और अर्थव्यवस्था से जुड़े विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि इस वर्ष पूरे मॉनसून सीजन में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना जताई गई है। आईएमडी के संशोधित अनुमान के अनुसार इस साल देश में दीर्घावधि औसत (LPA) का केवल 90 प्रतिशत वर्षा होने की उम्मीद है। भारत में 1971 से 2020 के आंकड़ों के आधार पर मॉनसूनी बारिश का एलपीए 87 सेंटीमीटर निर्धारित किया गया है। मौसम विज्ञान के नियमों के अनुसार यदि किसी वर्ष वर्षा एलपीए के 90 प्रतिशत से नीचे चली जाती है तो उसे कमजोर या कमी वाला मॉनसून माना जाता है। ऐसे में इस बार का अनुमान सामान्य और कमजोर मॉनसून की सीमा के बेहद करीब है। कम वर्षा का प्रमुख कारण प्रशांत महासागर में विकसित हो रही अल-नीनो (El Nino) परिस्थितियां बताई जा रही हैं। अल-नीनो के प्रभाव से मॉनसूनी हवाएं कमजोर पड़ती हैं और भारत में वर्षा की मात्रा घट जाती है। फिलहाल प्रशांत क्षेत्र में न्यूट्रल ENSO की स्थिति समाप्त हो रही है और धीरे-धीरे अल-नीनो की स्थिति विकसित हो रही है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि जून में अल-नीनो का प्रभाव अपेक्षाकृत कमजोर रहेगा, जिससे शुरुआती बुवाई और कृषि गतिविधियों को कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन अगस्त और सितंबर तक इसके मध्यम से मजबूत होने की आशंका है, जो खरीफ फसलों के लिए चुनौती बन सकती है। धान, दलहन और तिलहन जैसी फसलें वर्षा पर काफी निर्भर होती हैं और यदि सीजन के अंतिम चरण में बारिश कम होती है तो उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसका असर खाद्यान्न उपलब्धता, जलाशयों के जलस्तर और महंगाई पर भी पड़ सकता है। यही कारण है कि कृषि विशेषज्ञ किसानों को कम पानी वाली फसलों को अपनाने और जल संरक्षण पर विशेष ध्यान देने की सलाह दे रहे हैं। आने वाले कुछ सप्ताह यह तय करेंगे कि मॉनसून की शुरुआती देरी और अल-नीनो का बढ़ता प्रभाव भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था पर कितना असर डालता है।
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