भारत सरकार ने 1 जून 2026 से सौर ऊर्जा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण नियम लागू कर दिया है, जिसके तहत नई नेट-मीटरिंग और ओपन एक्सेस नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में केवल उन सोलर मॉड्यूल का उपयोग किया जा सकेगा जिनमें भारत में निर्मित सोलर सेल लगे हों। नए नियम के अनुसार सभी पात्र परियोजनाओं को सरकार की Approved List of Models and Manufacturers (ALMM)* की सूची-1 से सोलर मॉड्यूल और सूची-2 से सोलर सेल खरीदने होंगे। इस कदम का मुख्य उद्देश्य घरेलू सौर विनिर्माण उद्योग को बढ़ावा देना, आयात पर निर्भरता कम करना और भारत को सोलर उपकरणों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना है। सरकार का मानना है कि इससे "मेक इन इंडिया" अभियान को मजबूती मिलेगी और देश में सौर उपकरण निर्माण से जुड़े निवेश तथा रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। हालांकि सरकार ने उन परियोजनाओं को कुछ राहत देने का संकेत भी दिया है जिनमें पहले ही निवेश किया जा चुका है। जिन परियोजनाओं के लिए सोलर मॉड्यूल साइट पर पहुंच चुके हैं, इंस्टॉलेशन पूरा हो चुका है या निर्माण कार्य काफी आगे बढ़ चुका है, उन्हें परिस्थितियों के आधार पर अतिरिक्त समय दिया जा सकता है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने कहा है कि डेवलपर्स द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों और प्रगति रिपोर्ट के निष्पक्ष मूल्यांकन के बाद समय विस्तार पर विचार किया जाएगा। यह फैसला उद्योग संगठनों की उस मांग के बाद आया है, जिसमें उन्होंने पहले से चल रही परियोजनाओं को नए नियमों के कारण होने वाले वित्तीय नुकसान से बचाने के लिए राहत मांगी थी। विशेषज्ञों का कहना है कि इस नीति से अल्पकाल में कुछ चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं। ऊर्जा नीति शोध संस्था Centre for Social and Economic Progress के एसोसिएट फेलो रोहित विजय के अनुसार कई वाणिज्यिक एवं औद्योगिक (C&I) परियोजनाएं उच्च दक्षता वाली TOPCon तकनीक पर आधारित हैं, जिनके लिए पहले से विदेशी सेल और मॉड्यूल की खरीद की योजना बनाई गई थी। ऐसे में अचानक खरीद रणनीति बदलना कई डेवलपर्स के लिए आसान नहीं होगा। उनका अनुमान है कि कुछ परियोजनाओं की लागत बढ़ सकती है, जिससे बिजली शुल्क में 30 से 40 पैसे प्रति यूनिट तक की वृद्धि देखने को मिल सकती है। खासकर उन परियोजनाओं पर असर पड़ सकता है जहां भूमि सीमित है और अधिक ऊर्जा उत्पादन के लिए अत्याधुनिक तकनीक की आवश्यकता होती है। दूसरी ओर, घरेलू सौर उद्योग इस निर्णय को लंबे समय के लिए सकारात्मक मान रहा है। पिनाकी भट्टाचार्य जैसे उद्योग प्रतिनिधियों ने नियम का समर्थन करते हुए कुछ समय की अतिरिक्त छूट की मांग की है, जबकि विनय रुस्तगी का कहना है कि भारत के पास पर्याप्त सोलर सेल उत्पादन क्षमता उपलब्ध है और अगले एक वर्ष में यह क्षमता और बढ़ने वाली है। उनका मानना है कि सरकार द्वारा समय-सीमा को लेकर स्पष्ट रुख अपनाने से निवेशकों और निर्माताओं को भरोसा मिला है। कुल मिलाकर यह नीति अल्पकाल में लागत और आपूर्ति संबंधी चुनौतियां पैदा कर सकती है, लेकिन दीर्घकाल में भारत के सौर विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत बनाने, आयात निर्भरता घटाने और स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
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