भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और आयातित ईंधनों पर निर्भरता कम करने के लिए कोयला गैसीकरण (Coal Gasification) को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक पहल के रूप में आगे बढ़ा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि देश में एक मजबूत घरेलू कोयला गैसीकरण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित किया जाता है, तो भारत वैश्विक ऊर्जा बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव और ऊर्जा संकटों के प्रभाव को काफी हद तक कम कर सकता है। भारत के पास दुनिया के बड़े कोयला भंडारों में से एक है, इसलिए इस संसाधन का आधुनिक तकनीक के माध्यम से बेहतर उपयोग ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कोयला गैसीकरण एक ऐसी तकनीकी प्रक्रिया है, जिसमें कोयले को सीधे जलाने के बजाय उसे सिंथेटिक गैस (Syngas) में परिवर्तित किया जाता है। इस गैस में मुख्य रूप से हाइड्रोजन, कार्बन मोनोऑक्साइड और अन्य गैसें होती हैं, जिनका उपयोग उर्वरक निर्माण, रसायन उत्पादन, स्वच्छ ईंधन, बिजली उत्पादन तथा विभिन्न औद्योगिक कार्यों में किया जा सकता है। इससे आयातित प्राकृतिक गैस, कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलती है। साथ ही, यह तकनीक कोयले के अधिक कुशल और मूल्यवर्धित उपयोग का अवसर भी प्रदान करती है, जिससे ऊर्जा क्षेत्र की दीर्घकालिक स्थिरता को बल मिलता है। विशेषज्ञों के अनुसार, कोयला गैसीकरण केवल एक औद्योगिक परियोजना नहीं बल्कि आत्मनिर्भर भारत अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह पहल घरेलू संसाधनों के अधिकतम उपयोग, ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा, विदेशी मुद्रा की बचत और नए निवेश को आकर्षित करने में सहायक हो सकती है। इसके माध्यम से रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे तथा रसायन, उर्वरक और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में देश की उत्पादन क्षमता बढ़ेगी। हालांकि, इस तकनीक के सफल विस्तार के लिए आधुनिक अवसंरचना, पर्यावरणीय मानकों का पालन और लागत प्रभावी तकनीकों का विकास भी आवश्यक होगा। कुल मिलाकर, कोयला गैसीकरण भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने और दीर्घकालिक ऊर्जा आत्मनिर्भरता हासिल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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