सबका पर्यावरण, सबका विकास: क्या विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाना जरूरी है?

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। पिछले एक दशक में भारत ने सड़क, रेलवे, सुरंग, हवाई अड्डों और औद्योगिक परियोजनाओं के क्षेत्र में तेज विकास देखा है, लेकिन इसके साथ पर्यावरणीय चुनौतियां भी बढ़ी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक विकास आवश्यक है, लेकिन यदि वह प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्र की कीमत पर हो तो उसकी दीर्घकालिक लागत बहुत अधिक हो सकती है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, बाढ़, भूस्खलन और प्रदूषण जैसी समस्याएं इस चिंता को और गंभीर बनाती हैं। विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से हो रहे निर्माण कार्यों को लेकर लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं। Uttarakhand, Himachal Pradesh और पूर्वोत्तर के राज्यों में सड़क चौड़ीकरण, सुरंग निर्माण तथा जलविद्युत परियोजनाओं के कारण पर्यावरणीय प्रभावों पर चर्चा होती रही है। आलोचकों का तर्क है कि कई संवेदनशील क्षेत्रों में विकास कार्यों के दौरान भू-वैज्ञानिक और पारिस्थितिक जोखिमों का पर्याप्त आकलन नहीं किया गया। वहीं सरकारों का कहना है कि बेहतर कनेक्टिविटी, पर्यटन, राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थानीय आर्थिक विकास के लिए बुनियादी ढांचा आवश्यक है। चुनौती इन दोनों उद्देश्यों के बीच संतुलन बनाने की है। देश के बड़े शहरों में भी पर्यावरणीय दबाव स्पष्ट दिखाई देता है। वायु प्रदूषण, Bengaluru में जल संकट तथा Mumbai और Chennai में शहरी बाढ़ जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ते शहरीकरण और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव की ओर संकेत करती हैं। झीलों, तालाबों और वेटलैंड्स के सिकुड़ने से शहरों की प्राकृतिक जल निकासी प्रणाली प्रभावित हुई है, जिसके कारण मौसम की चरम घटनाओं का असर अधिक दिखाई देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य का विकास मॉडल केवल आर्थिक लाभ पर आधारित नहीं होना चाहिए, बल्कि पर्यावरणीय लागत और सामाजिक प्रभावों को भी ध्यान में रखना चाहिए। सौर ऊर्जा, हरित परिवहन, वर्षा जल संरक्षण, वन संरक्षण, वैज्ञानिक पर्यावरण प्रभाव आकलन और टिकाऊ पर्यटन जैसी नीतियां विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। विश्व पर्यावरण दिवस का संदेश भी यही है कि प्रकृति और विकास को प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि एक-दूसरे का पूरक माना जाए। दीर्घकालिक समृद्धि तभी संभव है जब आर्थिक प्रगति के साथ पर्यावरणीय संरक्षण को भी समान प्राथमिकता दी जाए।

Manisha Saini
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