भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की जून 2026 की मौद्रिक नीति समीक्षा की सबसे बड़ी बात यह नहीं थी कि रेपो रेट 5.25% पर स्थिर रखा गया, बल्कि यह थी कि अब RBI का मुख्य फोकस महंगाई और विकास दर के साथ-साथ रुपये की स्थिरता पर भी आ गया है। लगातार तीसरी बार ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया, जिससे यह संकेत मिला कि केंद्रीय बैंक फिलहाल अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ नहीं डालना चाहता। हालांकि, वैश्विक परिस्थितियों ने RBI की चिंताओं को बदल दिया है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है और ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है। भारत अपनी लगभग 90% तेल जरूरत आयात करता है, इसलिए तेल की बढ़ती कीमतें सीधे आयात बिल और महंगाई पर असर डालती हैं। दूसरी ओर, 2026 में रुपया एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली प्रमुख मुद्राओं में शामिल रहा है। डॉलर के मुकाबले इसकी कीमत लगभग 90 रुपये से गिरकर 96 रुपये तक पहुंच गई है, जिससे आयात और महंगे हो गए हैं। विदेशी निवेशकों की बिकवाली और डॉलर की बढ़ती मांग ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया है। RBI ने इस चुनौती का सामना ब्याज दरें बढ़ाकर नहीं, बल्कि विदेशी मुद्रा भंडार, बाजार हस्तक्षेप और पूंजी प्रवाह को प्रोत्साहित करने जैसे उपायों से करने का फैसला किया है। फरवरी के बाद से केंद्रीय बैंक ने रुपये की अत्यधिक गिरावट को रोकने के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग किया, जिसके कारण भंडार में लगभग 33 अरब डॉलर की कमी आई है। इसके बावजूद RBI ने किसी निश्चित विनिमय दर की रक्षा करने या केवल ब्याज दरों के जरिए रुपये को संभालने का रास्ता नहीं चुना। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने स्पष्ट संकेत दिया कि मौजूदा परिस्थितियों में घरेलू आर्थिक विकास को नुकसान पहुंचाए बिना मुद्रा को स्थिर रखना प्राथमिकता है। RBI का मानना है कि यदि दरें बढ़ाई जाती हैं तो कर्ज महंगा होगा, निवेश और खपत प्रभावित होंगे तथा आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। इसलिए केंद्रीय बैंक ने विकास और मुद्रा स्थिरता के बीच संतुलन बनाने की रणनीति अपनाई है। जून नीति समीक्षा के अनुमान भी इसी बदलाव को दर्शाते हैं। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए आर्थिक विकास दर का अनुमान 6.9% से घटाकर 6.6% कर दिया गया है, जबकि मुद्रास्फीति का अनुमान बढ़ाकर लगभग 5.1% कर दिया गया है। इसका अर्थ है कि महंगाई अब RBI की 4% की आदर्श सीमा से काफी ऊपर जाने के जोखिम के करीब पहुंच रही है। इस बार महंगाई की वजह घरेलू मांग नहीं, बल्कि आयातित कारक हैं—विशेष रूप से महंगा तेल और कमजोर रुपया। तेल की कीमत बढ़ने से परिवहन, लॉजिस्टिक्स, उर्वरक, उद्योग और अन्य क्षेत्रों की लागत बढ़ती है, जिसका असर पूरे अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। यही कारण है कि RBI की नीति का केंद्र अब केवल ब्याज दरें नहीं रहीं। मौद्रिक नीति का फोकस धीरे-धीरे रुपये की स्थिरता, विदेशी पूंजी प्रवाह और बाहरी आर्थिक झटकों के प्रबंधन की ओर स्थानांतरित हो रहा है। यही इस नीति समीक्षा का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है कि आज के दौर में रुपया केवल मौद्रिक नीति का परिणाम नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी चुनौती और सीमा बनता जा रहा है।
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