AI क्रेज का असर

आज AI हमारी जिंदगी आसान बना रहा है, लेकिन अगर यही टेक्नोलॉजी भविष्य में पानी और बिजली की कमी की वजह बन जाए, तो यह एक नई समस्या पैदा कर सकती है. AI का फ्यूचर जितना स्मार्ट दिखता है, उसका पर्यावरण पर असर उतना ही गंभीर होता जा रहा है. क्या दुनिया AI और नेचर के बीच बैलेंस बना पाएगी, या फिर टेक्नोलॉजी की यह रफ्तार हमें एक नए संकट की तरफ ले जा रही है दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का क्रेज जितनी तेजी से बढ़ रहा है, उतनी ही तेजी से इसके खतरनाक असर भी सामने आने लगे हैं. कई देशों में एंटी एआई प्रोटेस्ट जमीन पर देखने को मिल रहे हैं. यूएन यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट के मुताबिक AI का तेजी से बढ़ता इस्तेमाल उर्जा, पानी और जमीन जैसे संसाधनों पर बड़ा दबाव डाल रहा है. यह सिर्फ टेक्नोलॉजी का मामला नहीं है, बल्कि अब यह पर्यावरण और फ्यूचर की स्थिरता से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुका है. अगर सिर्फ बिजली की बात करें तो इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के अनुसार 2030 तक दुनिया भर के डेटा सेंटर करीब 945 टेरावॉट-आवर बिजली खपत कर सकते हैं . यह आंकड़ा समझने के लिए इसे आसान तरीके से समझिए. 945 टेरावॉट-आवर बिजली का मतलब है जापान जैसे पूरे देश की सालाना बिजली खपत के बराबर. यानी जो बिजली एक पूरा विकसित देश इस्तेमाल करता है, उतनी बिजली सिर्फ AI और डेटा सेंटर खा जाएंगे. यह ग्लोबल बिजली खपत का करीब 3 प्रतिशत तक हो सकता है. अब इसे और आसान भाषा में समझें तो अगर एक आम भारतीय घर साल भर में जितनी बिजली इस्तेमाल करता है, उसी बिजली में हजारों घर चल सकते हैं. लेकिन उतनी ही बिजली AI के सर्वर कुछ ही सेकंड में इस्तेमाल कर देते हैं जब लाखों लोग एक साथ AI से सवाल पूछ रहे होते हैं. पहले बिजली फैक्ट्री, घर और ट्रांसपोर्ट में खर्च होती थी. अब एक बड़ा हिस्सा डिजिटल दुनिया खा रही है, जो दिखती नहीं लेकिन असर बहुत बड़ा डालती है. लेकिन असली संकट पानी है. Earth.Org की रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक AI डेटा सेंटर करीब 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी खपत कर सकते हैं. यह पानी सर्वर को ठंडा रखने के लिए इस्तेमाल होता है, क्योंकि AI मॉडल्स को चलाने वाले चिप्स बेहद ज्यादा गर्म होते हैं. अब इस आंकड़े को समझना जरूरी है. 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी का मतलब है करीब 1.3 अरब लोगों की जरूरत के बराबर पानी. यानी जितना पानी भारत जैसे देश की पूरी आबादी को चाहिए, उतना पानी सिर्फ मशीनों को ठंडा रखने में खर्च हो सकता है. अगर इसे और आसान तरीके से समझें तो सोचिए एक शहर में रोज पानी की किल्लत होती है, लोग टैंकर मंगाते हैं, पानी बचाने की अपील होती है. वहीं दूसरी तरफ डेटा सेंटर लाखों लीटर पानी सिर्फ अपने सर्वर को ठंडा रखने में खर्च कर रहे हैं. यानी एक तरफ इंसान पानी के लिए जूझ रहा है और दूसरी तरफ मशीनें वही पानी इस्तेमाल कर रही हैं. अब इस मुद्दे पर सिर्फ एक्सपर्ट ही नहीं, आम लोग भी विरोध करने लगे हैं. खासकर अमेरिका में AI डेटा सेंटर के खिलाफ विरोध तेजी से बढ़ रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका के कई शहरों में लोगों ने डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स का विरोध किया है. इसकी सबसे बड़ी वजह है पानी और बिजली की भारी खपत. स्थानीय लोगों का कहना है कि इन डेटा सेंटर की वजह से उनके इलाके में पानी की कमी और बिजली पर दबाव बढ़ सकता है. कुछ जगहों पर तो प्रोजेक्ट्स को रोकना भी पड़ा. अमेरिका में पिछले साल करीब 200 अरब डॉलर के डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स विरोध के चलते या तो रोक दिए गए या देरी का शिकार हुए. यह दिखाता है कि यह सिर्फ टेक्नोलॉजी का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि अब यह पब्लिक इश्यू बन चुका है. लोगों को डर है कि कंपनियां उनके संसाधनों का इस्तेमाल करके AI चला रही हैं, लेकिन उसका फायदा आम जनता को उतना नहीं मिल रहा. खासकर पानी की कमी वाले इलाकों में यह चिंता और ज्यादा गहरी है. यूनाइटेड नेशन्स से जुड़ी रिपोर्ट्स में भी साफ चेतावनी दी गई है कि AI का यह बढ़ता इंफ्रास्ट्रक्चर पानी, जमीन और क्लाइमेट तीनों पर दबाव बना रहा है. खासकर उन इलाकों में जहां पहले से पानी की कमी है, वहां डेटा सेंटर का विस्तार बड़ी समस्या बन सकता है. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि AI की ज्यादातर बिजली खपत ट्रेनिंग में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के इस्तेमाल में होती है. IEA के विश्लेषण के मुताबिक करीब 80 से 90 प्रतिशत ऊर्जा खपत ‘इंफेरेंस’ में होती है, यानी जब आप और हम AI से सवाल पूछते हैं. मतलब हर बार जब आप ChatGPT से सवाल पूछते हैं, फोटो बनाते हैं या AI वीडियो जनरेट करते हैं, तो उसके पीछे सर्वर चालू होते हैं, बिजली खर्च होती है और उन्हें ठंडा रखने के लिए पानी भी लगता है. यानी AI जितना ज्यादा इस्तेमाल होगा, उतना ही ज्यादा संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा. टेक कंपनियां अब ग्रीन एनर्जी, रीसायकल पानी और नए कूलिंग सिस्टम पर काम कर रही हैं. कई कंपनियां दावा करती हैं कि वे अपने डेटा सेंटर को सोलर या विंड एनर्जी से चलाने की कोशिश कर रही हैं. लेकिन असली चुनौती यह है कि AI की डिमांड इतनी तेजी से बढ़ रही है कि ये प्रयास पीछे छूट सकते हैं. आज AI हमारी जिंदगी आसान बना रहा है, लेकिन अगर यही टेक्नोलॉजी भविष्य में पानी और बिजली की कमी की वजह बन जाए, तो यह एक नई समस्या पैदा कर सकती है. AI का फ्यूचर जितना स्मार्ट दिखता है, उसका पर्यावरण पर असर उतना ही गंभीर होता जा रहा है. क्या दुनिया AI और नेचर के बीच बैलेंस बना पाएगी, या फिर टेक्नोलॉजी की यह रफ्तार हमें एक नए संकट की तरफ ले जा रही है?

Manisha Saini
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