देश में डिजिटल लेनदेन में तेज बढ़ोतरी के बावजूद नकदी का महत्व कम नहीं हुआ है, बल्कि वित्त वर्ष 2025-26 में चलन में मुद्रा 11.9% बढ़कर रिकॉर्ड 41.68 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गई, जो कोविड के बाद सबसे तेज वृद्धि मानी जा रही है। Reserve Bank of India के आंकड़ों के मुताबिक इस दौरान कुल 4.44 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त नकदी सिस्टम में आई, जो नोटबंदी के बाद 2017-18 के बाद सबसे ज्यादा बढ़ोतरी है। यह ट्रेंड बताता है कि डिजिटल भुगतान तेजी से बढ़ने के बावजूद लोगों की नकदी पर निर्भरता बनी हुई है, खासकर ग्रामीण और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में, जहां कैश का उपयोग अभी भी प्रमुख है।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल पेमेंट्स ने लेनदेन का तरीका जरूर बदला है, लेकिन लोगों की बचत और सुरक्षा की सोच अभी भी नकदी से जुड़ी हुई है। State Bank of India के मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष के अनुसार, यूपीआई जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के तेजी से बढ़ने के साथ-साथ नकदी में बढ़ोतरी लोगों की एहतियाती मांग और अनौपचारिक सेक्टर की सक्रियता को दर्शाती है। वित्त वर्ष 2026 में यूपीआई ट्रांजैक्शन वैल्यू 21% बढ़कर 314.23 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई, जबकि ट्रांजैक्शन की संख्या में भी भारी उछाल आया, लेकिन इसके बावजूद नकदी का चलन 40 लाख करोड़ रुपये के पार चला गया। इसके पीछे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार, लगातार अच्छे मॉनसून, शादी सीजन, और टैक्स नियमों को लेकर छोटे व्यापारियों की सतर्कता जैसे कारण माने जा रहे हैं। IDFC First Bank की मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेन गुप्ता के अनुसार, ग्रामीण इलाकों में नकद लेनदेन का चलन अधिक होने से मुद्रा की मांग बढ़ी है। वहीं, 2000 रुपये के नोटों का बड़ा हिस्सा भी सिस्टम में वापस आ चुका है, जिससे नकदी संरचना में बदलाव आया है। कुल मिलाकर, यह स्पष्ट है कि भारत में डिजिटल और नकदी दोनों समानांतर रूप से बढ़ रहे हैं, जहां एक ओर तकनीक लेनदेन को आसान बना रही है, वहीं दूसरी ओर नकदी अभी भी भरोसे और जरूरत का अहम माध्यम बनी हुई है।
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