Reserve Bank of India ने बैंकों के लिए पूंजी नियमों में बड़ी ढील देते हुए निवेश उतार-चढ़ाव आरक्षित निधि (IFR) को खत्म करने का प्रस्ताव रखा है, जिससे बैंकिंग सेक्टर को सीधा फायदा मिलने की उम्मीद है। इस कदम से बैंकों की बैलेंस शीट अधिक लचीली होगी और पूंजी अनुपात (CRAR) पर सकारात्मक असर पड़ेगा। State Bank of India की रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, इस बदलाव से बैंकों के लगभग 35,000–40,000 करोड़ रुपये तक का IFR फंड मुक्त हो सकता है, जिसे वे बेहतर तरीके से इस्तेमाल कर सकेंगे—जैसे पूंजी मजबूत करने या मुनाफा बढ़ाने में।
इसके साथ ही RBI ने एक और अहम राहत दी है—अब बैंक अपने तिमाही मुनाफे को CRAR में शामिल कर सकेंगे, चाहे NPA प्रावधानों में उतार-चढ़ाव हो। पहले इसके लिए सख्त शर्तें थीं, जिससे बैंकों को पूरे साल इंतजार करना पड़ता था। इस बदलाव से बैंकों के पूंजी अनुपात में सालभर स्थिरता दिखेगी, हालांकि सालाना आधार पर कुल प्रभाव सीमित रहेगा।
IFR असल में एक बफर फंड था, जिसे बैंक ब्याज दरों में बदलाव के कारण बॉन्ड कीमतों में उतार-चढ़ाव से होने वाले नुकसान को कवर करने के लिए रखते थे। लेकिन RBI का मानना है कि अब जब मार्क-टू-मार्केट (MTM) वैल्यूएशन ज्यादा पारदर्शी हो गया है, तो अलग से ऐसे रिजर्व की जरूरत कम हो गई है। RBI गवर्नर Sanjay Malhotra के अनुसार, बाजार कीमतों को पूरी तरह बैलेंस शीट में दिखाना ही बेहतर है, जिससे बैंक की वास्तविक स्थिति साफ नजर आती है।विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से बैंकों के टियर-1 पूंजी अनुपात में 6–12 बेसिस पॉइंट तक सुधार हो सकता है। हालांकि Macquarie Capital के विश्लेषकों का कहना है कि बैंक IFR को पूरी तरह वापस नहीं लेंगे, बल्कि धीरे-धीरे अतिरिक्त रिजर्व बनाना बंद कर सकते हैं। कुल मिलाकर, यह कदम बैंकिंग सिस्टम को सरल, पारदर्शी और अधिक पूंजी-कुशल बनाने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
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