लागत की मार से जूझते हाईवे प्रोजेक्ट्स को सरकार ने दी राहत, 3 महीने के स्पेशल मुआवजा सिस्टम का ऐलान

महंगाई और बढ़ती लागत के दबाव से जूझ रहे हाईवे प्रोजेक्ट्स को राहत देने के लिए सरकार ने एक अहम कदम उठाया है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने 1 अप्रैल से 30 जून 2026 तक लागू होने वाला 3 महीने का विशेष लागत-वृद्धि क्षतिपूर्ति तंत्र (cost escalation compensation system) शुरू किया है। इसका मकसद साफ है—निर्माण कार्य की रफ्तार बनी रहे और ठेकेदारों पर बढ़ती लागत का बोझ कम हो सके।इस फैसले के पीछे सबसे बड़ी वजह वैश्विक स्तर पर बढ़ती कीमतें हैं। ईंधन, सीमेंट, स्टील और लॉजिस्टिक्स महंगे होने से हाईवे प्रोजेक्ट्स की लागत तेजी से बढ़ रही थी, जिससे कई परियोजनाएं धीमी पड़ने का खतरा पैदा हो गया था। सरकार ने इसे रोकने के लिए नियमों में अस्थायी ढील दी है ताकि कंपनियों को तुरंत राहत मिल सके।सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब EPC (Engineering, Procurement, Construction) और HAM (Hybrid Annuity Model) प्रोजेक्ट्स में ठेकेदारों को मासिक भुगतान किया जाएगा, बशर्ते काम गुणवत्ता मानकों के अनुसार हो। पहले भुगतान में देरी होने से कंपनियों का कैश फ्लो बिगड़ता था, लेकिन अब हर महीने पैसा मिलने से उनकी वित्तीय स्थिति सुधरेगी और साइट पर काम लगातार चलता रहेगा।इसके साथ ही प्राइस एडजस्टमेंट (मूल्य समायोजन) के नियमों में भी बदलाव किया गया है। पहले कीमतों के हिसाब से भुगतान तय करने में 3 महीने पुराना डेटा इस्तेमाल होता था, लेकिन अब सिर्फ 1 महीने पहले का WPI (थोक मूल्य सूचकांक) लिया जाएगा। इसका फायदा यह होगा कि बाजार में जो ताजा महंगाई है, उसका असर तुरंत भुगतान में दिखेगा और ठेकेदारों को नुकसान कम होगा।

सड़क निर्माण की एक अहम सामग्री बिटुमेन के लिए भी नियम बदले गए हैं। अब इसकी कीमत तय करने में भी ज्यादा हालिया (1 महीने पहले की) दर को आधार बनाया जाएगा, जिससे लागत में अचानक बढ़ोतरी का असर जल्दी कवर हो सके।HAM प्रोजेक्ट्स में भी बड़ा बदलाव किया गया है, जहां अब प्राइस इंडेक्स मल्टीपल (PIM) के आधार पर लागत बढ़ने का भुगतान हर महीने किया जाएगा। इससे ठेकेदारों और कंसेशनायर्स की नकदी स्थिति मजबूत होगी और उन्हें काम रोकने की जरूरत नहीं पड़ेगी।कुल मिलाकर, यह कदम एक तरह का “इमरजेंसी राहत पैकेज” है, जिसका मकसद हाईवे निर्माण को धीमा होने से बचाना है। अगर समय पर भुगतान और सही लागत समायोजन नहीं होता, तो बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स रुक सकते थे, जिससे अर्थव्यवस्था और रोजगार दोनों पर असर पड़ता। अब सरकार इस 3 महीने के तंत्र की समीक्षा करेगी और जरूरत पड़ने पर इसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है।

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