भीषण गर्मी और वर्षा की प्रतीक्षा के बीच मंगलवार को पंडित महेंद्र प्रसन्ना ने एक अनूठी संगीत प्रस्तुति देकर लोगों का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने तुलसी घाट पर पवित्र गंगा नदी के जल में खड़े होकर अपने साथी कलाकारों के साथ राग मेघ का वादन किया। यह प्रस्तुति केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि प्रकृति और संगीत के बीच गहरे संबंध को भी दर्शाती है। घाट पर मौजूद लोगों ने इस दुर्लभ दृश्य को उत्साह और श्रद्धा के साथ देखा। भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग मेघ का विशेष महत्व माना जाता है। परंपरागत मान्यता के अनुसार यह राग वर्षा ऋतु से जुड़ा हुआ है और इसके स्वरों में मेघों, बारिश और प्रकृति की शीतलता का भाव समाहित होता है। सदियों से संगीतज्ञ इस राग का गायन और वादन मानसून के आगमन तथा वर्षा की कामना से जोड़ते रहे हैं। इसी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए कलाकारों ने इस अवसर पर राग मेघ की प्रस्तुति दी, जिससे वातावरण संगीत की मधुर ध्वनियों से गुंजायमान हो उठा। धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी वाराणसी में आयोजित इस प्रस्तुति ने भारतीय संगीत की समृद्ध परंपरा को एक बार फिर जीवंत कर दिया। बढ़ती गर्मी और मौसम की चुनौतियों के बीच यह आयोजन लोगों को प्रकृति के प्रति संवेदनशील होने तथा भारतीय सांस्कृतिक धरोहर से जुड़ने का संदेश देता है। संगीत प्रेमियों का मानना है कि ऐसे आयोजन न केवल शास्त्रीय संगीत को नई पीढ़ी तक पहुंचाते हैं, बल्कि समाज में कला, संस्कृति और पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी बढ़ाते हैं।
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