पिछले 11 वर्षों में सबसे कम बारिश का अनुमान: मॉनसून की सुस्त चाल बढ़ा सकती है चिंता

देश में इस वर्ष मॉनसून की रफ्तार अपेक्षा से धीमी बनी हुई है, जिससे कई राज्यों में बारिश का असमान वितरण देखने को मिल रहा है। एक ओर मुंबई और महाराष्ट्र के कई हिस्सों में लगातार भारी बारिश हो रही है, वहीं दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और उत्तर भारत के अन्य क्षेत्रों में वर्षा की कमी बनी हुई है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुमान के अनुसार वर्ष 2026 में सामान्य से लगभग 10 प्रतिशत कम बारिश हो सकती है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है, तो यह पिछले 11 वर्षों का सबसे कमजोर मॉनसून माना जाएगा। बारिश की कमी का सीधा असर खेती, जल भंडारण और आम लोगों के जीवन पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौसम की यह असामान्य स्थिति आने वाले महीनों में कई चुनौतियां खड़ी कर सकती है। इस बार मॉनसून की कमजोरी के पीछे अल-नीनो को प्रमुख कारण माना जा रहा है। अल-नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भाग के असामान्य रूप से गर्म होने की प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो दुनिया भर के मौसम तंत्र को प्रभावित करती है। इसका असर भारत के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पर भी पड़ता है, जिससे बारिश की मात्रा कम हो जाती है और उसका वितरण असंतुलित हो जाता है। यही वजह है कि कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा और बाढ़ जैसे हालात बन रहे हैं, जबकि अन्य इलाके सूखे जैसी स्थिति का सामना कर रहे हैं। मुंबई में मॉनसून अपने सामान्य समय से 13 दिन की देरी से पहुंचा, लेकिन इसके बाद वहां कई इलाकों में 71 से 99 मिलीमीटर तक बारिश दर्ज की गई। दूसरी ओर उत्तर भारत के कई हिस्सों में पर्याप्त वर्षा नहीं होने से किसानों और जल प्रबंधन एजेंसियों की चिंता बढ़ गई है। मौसम विभाग का अनुमान है कि अल-नीनो का प्रभाव पूरे मॉनसून सीजन यानी जून से सितंबर तक बना रह सकता है और इसके कारण जुलाई तथा अगस्त तक अनियमित बारिश का दौर जारी रह सकता है। कहीं-कहीं भारी बारिश और स्थानीय बाढ़ की घटनाएं देखने को मिलेंगी, जबकि कई बड़े क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति बनी रह सकती है। कमजोर मॉनसून का सबसे बड़ा असर खरीफ फसलों जैसे धान, मक्का और सोयाबीन पर पड़ सकता है। जलाशयों में पानी कम भरने से पीने के पानी और सिंचाई की उपलब्धता भी प्रभावित हो सकती है। इसके साथ ही खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि और महंगाई बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते मौसम पैटर्न और जलवायु परिवर्तन के संकेतों को गंभीरता से समझने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में जल संकट, कृषि चुनौतियों और प्राकृतिक आपदाओं से बेहतर तरीके से निपटा जा सके।

Manisha Saini
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