भारत सरकार ने 1 अप्रैल 2026 से पूरे देश में पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण (E20) को अनिवार्य कर दिया है। सरकार का मानना है कि यह कदम देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने, किसानों की आय बढ़ाने और प्रदूषण घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इथेनॉल मुख्य रूप से गन्ने, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है, इसलिए इसका उपयोग बढ़ने से कृषि क्षेत्र और जैव ईंधन उद्योग को भी नई गति मिलने की उम्मीद है। भारत ने अपना E20 लक्ष्य निर्धारित समय से पहले हासिल कर लिया है, जिसे सरकार स्वच्छ ऊर्जा और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ी उपलब्धि मान रही है। हालांकि, इस नीति के साथ कई व्यावहारिक सवाल भी सामने आए हैं। अप्रैल 2023 से पहले खरीदे गए अधिकांश वाहन E20 के लिए पूरी तरह अनुकूल (E20 Compatible) नहीं हैं। ऐसे वाहन मालिकों का कहना है कि E20 के उपयोग से कुछ गाड़ियों में माइलेज कम हुआ है, इंजन की कार्यक्षमता प्रभावित हुई है तथा रखरखाव का खर्च बढ़ा है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि इथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में ऊर्जा घनत्व कम होता है, इसलिए कुछ वाहनों में ईंधन दक्षता पर सीमित प्रभाव पड़ सकता है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि अब उपभोक्ताओं के पास E5 या E10 जैसे कम इथेनॉल मिश्रण वाले पेट्रोल का विकल्प लगभग समाप्त हो गया है। कई लोगों का मानना है कि जिस प्रकार प्रीमियम पेट्रोल (XP95, XP100, Speed 97 आदि) अलग-अलग विकल्पों के रूप में उपलब्ध हैं, उसी तरह पुराने वाहनों के लिए कम इथेनॉल मिश्रण वाला पेट्रोल भी उपलब्ध कराया जा सकता है। दुनिया के कई देशों का अनुभव बताता है कि इथेनॉल मिश्रण को चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया है। ब्राजील, अमेरिका, थाईलैंड और फ्रांस जैसे देशों में उच्च इथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन के साथ-साथ कम मिश्रण वाले विकल्प भी उपलब्ध हैं, जिससे वाहन मालिक अपनी गाड़ी के अनुसार ईंधन चुन सकते हैं। विशेष रूप से ब्राजील ने पहले बड़ी संख्या में फ्लेक्स-फ्यूल वाहन विकसित किए और उसके बाद उच्च इथेनॉल मिश्रण को व्यापक स्तर पर लागू किया। भारत में भी इथेनॉल मिश्रण से ऊर्जा आयात में कमी, विदेशी मुद्रा की बचत और पर्यावरण संरक्षण जैसे अनेक लाभ मिल सकते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि पुराने वाहनों के हितों, उपभोक्ता की पसंद और तकनीकी अनुकूलता को ध्यान में रखते हुए संतुलित नीति अपनाना भी उतना ही आवश्यक है। आने वाले वर्षों में सरकार के सामने चुनौती यही होगी कि वह स्वच्छ ऊर्जा के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के साथ-साथ करोड़ों वाहन मालिकों की व्यावहारिक जरूरतों और उपभोक्ता अधिकारों का भी उचित ध्यान रखे।
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